यह घोषणापत्र अर्पित है उन भारतीय नागरिकों व सैनिकों को- जो एक मुर्दा क़ौम में रहते हुए भी- खुद को जिन्दा समझते हैं!

शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

भूमिका


यह घोषणापत्र क्या है?
       यह घोषणापत्र देश की प्रायः सभी समस्याओं का विन्दुवार (To the Point) समाधान सुझाता है और समग्र रुप से खुशहाल, स्वावलम्बी और शक्तिशाली भारत के निर्माण का खाका (Blueprint) प्रस्तुत करता है।

यह खाका लागू कैसे होगा?
       इसके लिए देश में 10 वर्षों के लिए एक नये प्रकार की शासन-प्रणाली कायम की जायेगी। इस प्रणाली के तीन प्रमुख अंग होंगे- 1. प्रधानमंत्री (Prime Minister), 2. मंत्री-परिषद (Cabinet) और 3. मंत्री-सभा (Council)। तीनों की व्याख्या नीचे दी जा रही हैः
       प्रधानमंत्रीः एक जागरुक आम नागरिक को दस वर्षों के लिए देश का प्रधानमंत्री नियुक्त किया जायेगा। प्रधानमंत्री दस वर्षों के लिए देश की विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और सशस्त्र-सेनाओं का प्रमुख होगा। विद्वानों की एक मंत्री-परिषद और मंत्री-सभा के मार्गदर्शन एवं नियंत्रण में काम करते हुए वह प्रस्तुत घोषणापत्र को लागू करेगा और देश को खुशहाल, स्वावलम्बी और शक्तिशाली राष्ट्र बनायेगा। दस वर्षों के बाद एक आदर्श चुनाव का अयोजन करवा कर वह देश में सही मायने में एक लोक’-तांत्रिक या जन’-तांत्रिक व्यवस्था कायम करेगा।
       जिस नागरिक को प्रधानमंत्री नियुक्त किया जायेगा, उसमें कुछ मानवोचित एवं नायकोचित गुण तो होने ही चाहिए, साथ ही, निम्न तीन गुण जरुर होने चाहिए- 1. देशभक्ति, 2. ईमानदारी और 3. साहस।
       प्रधानमंत्री पद के इस स्वरुप एवं चरित्र को देखते हुए इस शासन-प्रणाली को कल्याणकारी तानाशाही’ (Welfare Dictatorship) कहा जा सकता है।
       मंत्री-परिषदः प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन तथा उस पर नियंत्रण रखने के लिए एक चौदह-सदस्यीय मंत्री-परिषद का गठन किया जायेगा। मंत्री-परिषद में निम्न 14 विषयों/क्षेत्रों के विशेषज्ञ/विद्वान मौजूद होंगे- 1. किसानी, 2. मजदूरी, 3. खेल-कूद, 4. विज्ञान, 5. संस्कृति, 6. शिक्षा, 7. नारी-सशक्तिकरण, 8. विदेश-नीति, 9. राष्ट्रीय सुरक्षा, 10. संविधान/न्याय, 11. अर्थनीति, 12. पर्यावरण, 13. समाजसेवा और 14. पत्रकारिता।     
       मंत्री-परिषद के लिए जिन विशेषज्ञ/विद्वानों का चयन किया जायेगा, वे देश/समाज के वरिष्ठ, सम्मानित एवं सच्चरित्र नागरिक होंगे। इनके चयन के लिए देश के सभी भाषाओं के अखबारों के सम्पादकों से सुझाव मँगवाये जायेंगे। सम्पादकगण चाहें, तो अपने निजी सुझाव के साथ एक जनमत-सर्वेक्षण करवा कर उसके परिणाम भी संलग्न कर सकेंगे।
       प्रस्तुत घोषणापत्र की बातों के अलावे किसी और मुद्दे पर निर्णय लेते समय प्रधानमंत्री के लिए मंत्री-परिषद के 14 में से कम-से-कम 9 सदस्यों (दो-तिहाई) की सहमति लेना अनिवार्य होगा।
       इस मंत्री-परिषद को सिर्फ परिषदकहा जा सकता है; या फिर, इसे चाणक्य-सभाका नाम भी दिया जा सकता है।
       मंत्री-सभाः परिषद के सदस्यगण अपने-अपने विषय/क्षेत्र से जुड़े 5 सहयोगी चुनेंगे। इन पाँच सहयोगियों में से किसी एक को वे अपना उत्तराधिकारी भी नामित करेंगे। परिषद के सदस्य स्वयं देश के जिस अंचल से आयेंगे, उस अंचल को छोड़कर बाकी पाँच अंचलों से एक-एक सहयोगी को वे चुनेंगे। (प्रस्तुत घोषणापत्र में यथास्थान देश के कुल छह अंचलों की बात कही गयी है- उत्तर-पूर्वांचल, पूर्वांचल, पश्चिमांचल, उत्तरांचल, दक्षिणांचल और मध्यांचल।) परिषद के सदस्यों से यह अपेक्षा की जायेगी कि वे अपने कम-से-कम तीन सहयोगियों की सहमति से ही कोई निर्णय लेकर उसे प्रधानमंत्री तक पहुँचायें।
       परिषद के 70 सहयोगियों के समूह को मंत्री-सभाया सिर्फ सभानाम दिया जायेगा।
       जटिल एवं महत्वपूर्ण मामलों पर विचार-विमर्श परिषदएवं सभाके संयुक्त अधिवेशनों में हुआ करेगा।
       संयुक्त अधिवेशन के दौरान दो-तिहाई- यानि 56- सदस्य मिलकर प्रधानमंत्री के किसी निर्णय को वीटोभी कर सकेंगे, बशर्ते कि वह निर्णय प्रस्तुत घोषणापत्र की बातों से बाहर का हो।
       परिषद/सभा के सदस्यों से अपेक्षाः परिषद/सभा के सदस्यों से यह अपेक्षा रखी जायेगी कि वे प्रस्तुत घोषणापत्र और निम्न धारणाओं या विचारधाराओं के प्रति अपनी सहमति एवं प्रतिबद्धता व्यक्त करेंगेः-
       1. वर्तमान औपनिवेशिकव्यवस्था को हटाकर इसके स्थान पर एक मौलिक एवं भारतीय व्यवस्था कायम करना।
       2. नयी कायम होने वाली व्यवस्था को नेताजी सुभाष और शहीद भगत सिंह के विचारों/सपनों के अनुरुप बनाना।
       3. शोषण, दोहन और उपभोग पर आधारित वर्तमान अर्थनीति के स्थान पर समता, पर्यावरण-मित्रता और उपयोग पर आधारित अर्थनीति को अपनाना।
       4. एक देश- भारत, एक नागरिकता- भारतीय और एक संस्कृति- भारतीयता (Indianity) के सिद्धान्त को अपनाना।     
       5. भारतीय श्रमशक्ति, भारतीय प्रतिभा और भारतीय संसाधनों पर पूर्ण विश्वास- कि इनके बल पर भारत को खुशहाल, स्वावलम्बी और शक्तिशाली बनाया जा सकता है।
       6. सरकार द्वारा गरीबों, कमजोरों एवं आम लोगों के प्रति फूल से भी कोमलऔर अमीरों, ताकतवरों एवं खास लोगों के प्रति वज्र से भी कठोररवैया अपनाते हुए नीतियाँ बनाना।
       7. सत्ता के विकेन्द्रीकरण पर विश्वास- अर्थात् स्थानीय स्वशासनको सुदृढ़ बनाना।
       8. भारत के नेतृत्व में एक आदर्श विश्व-व्यवस्था की स्थापना करने के लिए प्रयास करना।

क्या यह घोषणापत्र पत्थर की लकीर है?
       नहीं, इसमें आवश्यकतानुसार तथा परिस्थितियों के अनुसार बदलाव किये जायेंगे, मगर बदलाव नदी के बहते जल के समान होंगे- नदी के किनारे नहीं बदलते। प्रस्तुत घोषणापत्र में भी 1. देश की खुशहाली और 2. आम जनता की भलाई को ध्यान में रखते हुए ही बदलाव किये जायेंगे।
       बदलाव जब प्रधानमंत्री करना चाहे, तो उसके लिए परिषद के 5 सदस्यों की सहमति आवश्यक होगी; और बदलाव जब परिषद या सभा के सदस्य लाना चाहें, तो संयुक्त अधिवेशन में दो-तिहाई का बहुमत आवश्यक होगा।

नयी शासन-प्रणाली कैसे कायम होगी?
       उपर्युक्त नयी शासन-प्रणाली नागरिकों के एक आन्दोलन या क्र्रान्ति के माध्यम से स्थापित होगी; पूर्व-सेनानी इस आन्दोलन या क्रान्ति में अग्रिम पंक्तिकी भूमिका निभायेंगे (ताकि पुलिस एवं अर्द्धसैन्य बलों के जवान इसे कुचलने का दुस्साहस न कर सकें), और सबसे महत्वपूर्ण बात- इस आन्दोलन या क्रान्ति को भारतीय सशस्त्र सेनाओं का मौन या नैतिक समर्थन प्राप्त होगा!

सेनाओं का सहयोग माँगना क्या उचित होगा?
       इस बात को रेखांकित कर दिया जाय कि यहाँ पूर्व-सेनानियों (भूतपूर्व सैनिकों) से सक्रियसहयोग माँगा जा रहा है, जबकि सशस्त्र सेनाओं से सिर्फ नैतिकया मौनसमर्थन की आशा रखी जा रही है। एक महादेश के आकार वाले देश में सेनाओं का नैतिक या मौन समर्थन हासिल किये बिना शासन-प्रणाली में परिवर्तन (परिवर्तन भले 10 साल के लिए होगा) लाने के बारे में सोचना भी व्यर्थ है! दूसरी तरफ, सेनाओं के लिए भी यह एक अवसर होगा कि वे अपने माथे पर लगे 70 साल पुराने दाग को धो सकती हैं।
       1944-45 में जब नेताजी सुभाष अँग्रेजों को मार भगाने और देश को आजाद कराने के लिए आजाद हिन्द फौज के साथ दिल्ली के लिए कूच कर रहे थे, तब हमारी सेनाओं के भारतीय जवानों ने ही महान ब्रिटिश साम्राज्यकी रक्षा करते हुए उन्हें रोका था, उनसे युद्ध किया था और उन्हें पराजित किया था।
       आज सात दशकों बाद उन्हीं नेताजी सुभाष को स्वतंत्र भारत के पहले प्रधान का सम्मान देने और उन्हीं के सपनों के भारत के निर्माण के लिए कोशिश की जा रही है। ऐसे में, भारतीय सेनाओं के जवानों का फर्ज बनता है कि इस बार वे औपनिवेशिक व्यवस्थाकी रक्षा करने का प्रयास न करें। (ध्यान रहे, इस व्यवस्था को अँग्रेजों ने दुनिया के सबसे बड़े उपनिवेश को गुलाम बनाये रखने के लिए बनाया था, न कि भारत को एक खुशहाल, स्वावलम्बी और शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के लिए।) अगर फिर भी, भारतीय सेनाओं के जवान इस व्यवस्था की रक्षा के लिए खड़े हो जाते हैैंं, तो इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा।
       आज से सौ साल बाद हममें से कोई जीवित नहीं रहेगा, मगर इतिहास में सब दर्ज हो जायेगा कि जब देश की किस्मत करवट लेने वाली थी, तब कौन किसके पक्ष में खड़ा था!
       काल किसी को क्षमा नहीं करता।

हमारे राजनेताओं की प्रतिक्रिया क्या होगी?
       वर्तमान औपनिवेशिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए हमारे आजकल के राजनेतागण बदलाव चाहने वालों के खिलाफ उन्हीं नीतियों का प्रयोग कर सकते हैं, जिनका प्रयोग कभी अँग्रेजों ने सफलतापूर्वक किया था, जैसे-
       फूट डालो और राज करो। 1857 की क्रान्ति के बाद से ही अँग्रेजों ने इस नीति को अपनाना शुरु किया था। इसकी अन्तिम परिणति है- देश का तीन टुकड़ों में बँटा होना। आज हमारे राजनेतागण भी बदलाव चाहने वालों के बीच तरह-तरह की फूट पैदा करने की कोशिश कर सकते हैं।
       सुरक्षा डाट अँग्रेजों ने 1885 में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना एक सेफ्टी वॉल्वके रुप में की थी, ताकि आजादी की चाह रखने वालों के आक्रोश की हवा निकाली जा सके। इसकी अन्तिम परिणति यह हुई कि हमारा देश ब्रिटिश साम्राज्य की गुलामी से आजाद नहीं हुआ, बल्कि राष्ट्रमण्डल’ (Commonwealth) की छतरी के नीचे सत्ता का हस्तांतरणहुआ। आज हमारे राजनेतागण भी बदलाव चाहने वालों के आक्रोश की हवा निकालने के लिए चाणक्य सभा’-जैसी एक सभा के गठन का ढोंग कर सकते हैं।
       दमन। अँग्रेजों ने 1942 के भारत छोड़ोआन्दोलन का कुचलने के लिए दमन चक्र चलाया था। हमारे राजनेतागण भी खुशहाल भारतआन्दोलन को कुचलने के लिए पुलिसिया दमन का सहारा ले सकते हैं।
       पहले और दूसरे अस्त्र से बचने के लिए सतर्कता की ढाल का सहारा लिया जा सकता है, मगर तीसरे अस्त्र से बचने के लिए क्रान्तिकारियों के पास कुछ नहीं होता है, वे सिर्फ कातिल के बाजुओं की ताकत को तौल सकते हैं, बस! (...इसीलिए तो सेनाओं का मौन/नैतिक समर्थन चाहिए।)

क्या यह सब सम्भव है?
       बिलकुल नहीं! अर्थात् इस देश में इस तरह के परिवर्तन असम्भवहैं। हम भारतीय, चाहें अशिक्षित हों या शिक्षित, आम तौर पर लकीर के फकीर होते हैं; लीक से हटकर कोई बात सोचना पाप समझते हैं; किसी क्रान्तिकारी (Revolutionary) या आमूल-चूल (Upside down) परिवर्तन की कल्पना से ही हमारी रूह काँप उठती है, और जो सबसे बड़ा दुर्गुण हममें पाया जाता है, वह यह है कि किसी राजनेता/राजनेत्री या किसी राजनीतिक दल के हम अन्धभक्त की हद तक अनुयायी बन जाते हैं और इसके बाद किसी दूसरे विचार को सुनना तक बर्दाश्त नहीं करते- समझना तो बहुत दूर की बात है।

फिर यह प्रयास क्यों?
       फिर भी, अगर इस घोषणापत्र को जारी किया जा रहा है, तो इसके पीछे निम्न कारण हैं:-
       1. नागरिकों व सैनिकों के बीच जो दो-चार प्रतिशत जिन्दालोग मौजूद हैं, वे अगर चाह लें, तो बात बन सकती है।
       2. नेताजी सुभाष का कहना है कि एक अच्छा क्रान्तिकारी सदैव अच्छेकी उम्मीद रखता है और बुरेके लिए तैयार रहता है। अतः अच्छेकी उम्मीद के साथ इसे जारी किया जा रहा है।
       3. अगर किसी सम्भवकार्य को ही पूरा करने का प्रयास किया, तो अपने जीवन में हमने किया ही क्या?


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