बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

अध्याय- 20: ग्राम-पंचायतों/वार्ड परिषदों का गठन

     ग्राम-पंचायत (ग्रामीण एवं अर्द्धशहरी क्षेत्रों के लिए)

20.1    ‘जनसंसद’ (अगला अध्याय) के गठन के लिए प्रत्येक पंचायत से जो 6 प्रतिनिधि चुने जायेंगे, उन्हीं में से वरिष्ठतम व्यक्ति को सरपंच मानते हुए बाकी 5 सदस्यों के समूह को पंचायत माना जायेगा। (क्रमांक- 21.3 देखें।)
20.2    इसी के साथ, अलग-अलग व्यवसायों से जुड़े नागरिक अपने 5-5 प्रतिनिधियों को मौखिक रूप से चुनते हुए एक ‘ग्राम सभा’ का भी गठन करेंगे। (श्रमिक, कारीगर, कृषक, व्यवसायी, नौकरीपेशा, स्वरोजगार- जैसे कई व्यवसाय समूह बनाये जा सकते हैं।)
20.3    हालाँकि ग्राम-सभा में प्रतिनिधियों के रूप में महिलायें भी चुनी जा सकती हैं, फिर भी, पंचायत की सभी महिलायें मिलकर अलग से अपने 5 प्रतिनिधि चुनेंगी।
20.4    पंचों में सहमति न बनने की दशा में ‘ग्राम सभा’ की बैठक बुलाई जायेगी और इस सभा में बहुमत के निर्णय को अन्तिम माना जायेगा।
20.5    गाँव के सभी ‘परिवार’ अपनी आय, उपज, या शारीरिक/बौद्धिक श्रम का एक अंश (स्वेच्छा से या ‘कर’ के रूप में) ग्राम पंचायत को प्रदान करेंगे, ताकि ग्राम पंचायत प्राथमिक शिक्षा, जन-स्वच्छता, सामुदायिक मनोरंजन, खेल-कूद, बे-सहारों को सहारा इत्यादि की व्यवस्था कर सके। (कृपया परिशिष्ट- 'ऊ': ग्राम पुत्र/पुत्री अवधारणा भी देखें।)
20.6    पंचायत को अंश या कर के रूप में मिलने वाले अनाजों को अगली फसल तैयार होने तक सामुदायिक भण्डार-गृहों में सुरक्षित रखा जायेगा- ये भण्डार जरूरतमन्दों के लिये तथा बुरे वक्त में सबके लिये काम आयेंगे; साथ ही, पिछले साल के भण्डार को बेचकर पंचायत आय भी प्राप्त कर सकती है।
20.7    विवाहित सरकारी अधिकारियों के लिये एक वर्ष की ‘ज्ञानदूत दम्पत्ती सेवा’ अनिवार्य की जायेगी- इस सेवा में सरकारी अधिकारी सपरिवार एक वर्ष तक गाँव में रहेंगे, उनके लिए इण्टरनेट से जुड़ा एक कार्यालय होगा, जहाँ से वे ग्रमीणों को न केवल सरकारी सूचनायें, जमीनों के ब्यौरे आदि उपलब्ध करायेंगे, बल्कि विश्व के नवीनतम घटनाक्रम से उन्हें वे अवगत रखेंगे।
20.8    राष्ट्रीय सरकार में ‘ग्राम पंचायत’ विभाग बनाया जायेगा, जो ‘ज्ञानदूत दम्पत्तियों’ के माध्यम से सीधे गाँवों से जुड़ा होगा।
20.9    राष्ट्रीय सरकार पंचायतों को बराबर-बराबर विकास राशि मुहैया करायेगी, जबकि राज्य सरकार पंचायत के लिए ‘जनसंसद’ द्वारा पारित योजनाओं के आधार पर विकास राशि की व्यवस्था करेगी।
20.10    सामाजिक भेद-भाव को न मानने वाली तथा इस दिशा में ठोस उदाहरण प्रस्तुत करने वाली ग्राम पंचायतों को राष्ट्रीय सरकार द्वारा न केवल पुरस्कृत किया जायेगा, बल्कि बहुत बड़ी विकास राशि भी उन्हें प्रदान की जायेगी।

    वार्ड-परिषद (शहरी क्षेत्रों के लिए)

20.11    ‘जनसंसद’ के लिए प्रत्येक वार्ड से जो 6 प्रतिनिधि चुने जायेंगे, उनके समूह को ही वार्ड-परिषद कहा जायेगा। (क्रमांक- 21.3 देखें।)
20.12    एक नगर के अन्दर जितने भी वार्ड-परिषद होंगे, उन सबसे एक-एक प्रतिनिधि को लेकर ‘नगर-परिषद’ का गठन किया जायेगा। (कहने की आवश्यकता नहीं, सर्वाधिक मत पाने वाला ही नगर-परिषद में अपने वार्ड का प्रतिनिधित्व करेगा।)
20.13    इसी प्रकार, एक महानगर के अन्दर के सभी उपमहानगरों में उपमहानगर-परिषद का गठन किया जायेगा और फिर सभी उपमहानगर-परिषदों से एक-एक प्रतिनिधि को चुनकर महानगर-परिषद का गठन किया जायेगा। (यहाँ भी उपर्युक्त नियम लागू किया जा सकता है- वार्ड के 6 प्रतिनिधियों में से सर्वाधिक मत पाने वाला उपमहानगर-परिषद में अपने वार्ड का प्रतिनिधित्व करेगा और उपमहानगर-परिषद में सर्वाधिक मत पाने वाला महानगर-परिषद में अपने उपमहानगर का प्रतिनिधित्व करेगा।) 
20.14    नगरपाल और महानगरपाल के लिए अलग से चुनाव करवाये जा सकते हैं- यानि शहरी क्षेत्रों के नागरिक दो मतदान करेंगे- (क) अपने वार्ड के लिए पार्षद चुनने के लिए और (ख) अपने नगर या महानगर के लिए नगरपाल या महानगरपाल चुनने के लिए।

    भत्ते

20.15    ग्राम-पंचायत के पंचों को राज्य सरकार की ओर से कुछ भत्ते दिये जायेंगे, मगर ग्राम-सभाओं की सदस्यता अवैतनिक रहेगी।
20.16    नगरों-महानगरों में पार्षदों आदि के लिए वेतन और/या भत्तों का निर्धारण नगर-परिषद और महानगर-परिषद स्वयं किया करेंगे- इसके लिए वे नागरिकों पर कुछ कर लगायेंगे। (जाहिर है, जिस अनुपात में वे कर लगायेंगे, उसी अनुपात में उन्हें नागरिकों को सुविधायें भी देनी पड़ेंगी- अन्यथा नागरिक कर नहीं चुकाने के लिए स्वतंत्र होंगे!)
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