बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

अध्याय- 45: यौन अपराध

45.1    यौन अपराध- खासकर बलात्कार- के मामले बन्द अदालतों में चलाये जायेंगे।
45.2    इन अदालतों में "ज्यूरी" का होना अनिवार्य होगा, जिसमें सामाजिक कार्यकर्ता, मनोविज्ञानी, पुलिस-अधिकारी, वकील, डॉक्टर तथा पत्रकार के रूप में 6 महिला और 6 पुरूष सदस्य होंगे।
45.3    अदालत में पीड़िता स्त्री द्वारा एक बार अपराध में अपनी "असहमति" या अपने समर्पण को किसी किस्म की "मजबूरी" बताये जाने के बाद इसे गलत साबित करने के लिए बहस नहीं की जायेगी।
45.4    वास्तव में, पुरूष द्वारा अपनी पत्नी तथा "नगरवधू" (क्रमांक- 33.3) के अलावे किसी और के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने या ऐसी कोशिश करने को ही इस देश में दण्डनीय अपराध माना जायेगा- नाबालिग के साथ ऐसा करने पर यह ‘काल कोठरी’ में डाल दिये जाने लायक अपराध होगा। (‘काल कोठरी’, यानि जहाँ सूर्य के दर्शन नही होंगे।)
45.5    स्त्री द्वारा अपनी सहमती या समर्पण की बात स्वीकार करने पर यह "बलात्कार" नहीं, बल्कि "अनैतिक सम्बन्ध" का मामला बन जाएगा; और स्त्री-पुरूष दोनों को चेतावनी, जुर्माने से लेकर कारावास तक की सजा दी जा सकेगी। (जाहिर है कि किसी "तीसरे पक्ष" द्वारा शिकायत दर्ज कराने के बाद ही अनैतिक सम्बन्ध के मामले अदालतों तक आ पायेंगे। यही नियम समलैंगिक सम्बन्धों के मामलों पर भी लागू होगा।)
45.6    बलात्कार के प्रत्येक मामले में बलात्कारी को जेल की सजा तो मिलेगी ही; इसके अलावे, "स्त्री-हारमोन" का इंजेक्शन लगाकर उसका लिंग-परिवर्तन किया जाय या नहीं- इसके लिए बाकायदे जनमत-सर्वेक्षण करवाया जायेगा और उसी अनुरूप कार्रवाई की जायेगी। (जिनका लिंग-परिवर्तन होगा, उन्हें जेल की सजा पूरी होने के बाद एक "नयी पहचान" के साथ रिहा किया जायेगा- अब वह इस नयी पहचान के साथ समाज में जीना चाहे या नहीं, यह उसकी मर्जी होगी।)
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