मंगलवार, 11 अक्तूबर 2016

आह्वान


साथियों, 
जय हिन्द
  • 1943 में 21 अक्तूबर के दिन सिंगापुर में नेताजी सुभाष द्वारा स्थापित "स्वतंत्र भारत की अन्तरिम सरकार" (आरज़ी हुकूमत-ए-आजाद हिन्द/Provisional Government of Free India) को वैधानिक मान्यता देते हुए;
  • "सत्ता-हस्तांतरण" की शर्तों को रद्द करते हुए;
  • "राष्ट्रमण्डल" (कॉमनवेल्थ) की सदस्यता का परित्याग करते हुए;
  • नेताजी सुभाष को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधान का सम्मान देते हुए;
  • 1935 के अधिनियम पर आधारित वर्तमान संविधान के स्थान पर "भारत-भारतीय-भारतीयता" पर आधारित एक नया संविधान लागू करते हुए;
  • देश के सभी "बड़े" भ्रष्टों को निकोबार के किसी टापू पर निर्वासित करते हुए;
  • सरकारी खजाने की लूटी/बर्बाद की गयी राशि की पाई-पाई वसूलते हुए;
  • विश्व-बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन द्वारा संचालित "शोषण-दोहन-उपभोग" पर आधारित वर्तमान विश्व अर्थनीति के चंगुल से देश को मुक्त कराते हुए;
  • "समता-पर्यावरणमित्रता-उपयोग" पर आधारित जनकल्याणकारी नीतियों को लागू करते हुए;
  • 1:15 के अनुपात पर नया सरकारी वेतनमान बनाकर इसी वेतनमान पर बहालियाँ करके नयी भारतीय राष्ट्रीय सेना, पुलिस, प्रशासन, न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य, इत्यादि व्यवस्थाओं का गठन करते हुए;
  • हर नागरिक को शिक्षित बनाते हुए;
  • हर हाथ को रोजगार देते हुए;
  • हर देशवासी के दिल में "भारतीयता" के अहसास को जगाते हुए;
  • भारतीय प्रतिभा, भारतीय श्रमशक्ति तथा भारतीय संसाधनों के बल पर भारत को खुशहाल, स्वावलम्बी एवं शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के लिए...
  • आईये, हम सभी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और शहीदे-आजम भगत सिंह के अनुयायी एक हों, लामबन्द हों, और उनके सपनों के भारत के निर्माण के लिए स्पष्ट रास्ता चुनें और स्पष्ट नीतियाँ बनायें...
  • वर्षों तक सोच-विचार करके व्यक्तिगत रुप से मैं जिस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ, वह यह है कि हमारे भारत को 10 वर्षों के लिए एक विशेष प्रकार की शासन-व्यवस्था की जरुरत है। ऐसी शासन-व्यवस्था, जो विभिन्न विषयों के विद्वानों की एक "चाणक्य सभा" के निर्देशन में अमीरों एवं ताकतवरों के प्रति वज्र से भी कठोर तथा गरीबों एवं कमजोरों के प्रति फूल से भी कोमल रुख अपनाते हुए नीतियाँ बनाये; इस देश को दस वर्षों के अन्दर खुशहाल, स्वावलम्बी एवं शक्तिशाली राष्ट्र बनाये और उसके बाद आदर्श चुनाव का आयोजन करवाते हुए देश में एक "आदर्श लोकतांत्रिक व्यवस्था" कायम करे। 
  • ऐसी शासन-व्यवस्था कायम तो होगी एक जनान्दोलन के माध्यम से ही, मगर उस आन्दोलन को सेना का मौन या नैतिक समर्थन भी हासिल रहना चाहिए। ऐसा तभी सम्भव है, जब इस जनान्दोलन में "पूर्व-सेनानियों' की भूमिका "हरावल"- "अग्रिम दस्ते" की हो- क्योंकि देश में यही एकमात्र समूह है, जिसे "नागरिकों" व "सैनिकों" दोनों का साथ एवं सहयोग मिलेगा! 
  • जहाँ तक समय की बात है, तो ऐसा तभी सम्भव होगा, जब देश के नागरिकों की हर वो उम्मीद चूर-चूर हो जाय, जो उन्होंने विभिन्न राजनेताओं या जननेताओं से लगा रखी है। इसकी शुरुआत हो चुकी है।
  • तब सेना का नैतिक समर्थन हासिल करते हुए एक जनान्दोलन की तैयारी की जा सकती है। तब तक हमारा फर्ज बनता है कि हम लामबन्द- Mobilise-  होने की कोशिश करें तथा अपने सपनों के भारत की स्पष्ट रूपरेखा देशवासियों के सामने रखें।
  • मैं अपनी तरफ से एक "घोषणापत्र"- Manifesto- प्रस्तुत कर रहा हूँ। कृपया इसका अध्ययन करें, संशोधन सुझायें, हो सके, तो अन्यान्य भाषाओं में इसका अनुवाद प्रस्तुत करें और देश की आम जनता के बीच इसे प्रचारित-प्रसारित करते हुए उन्हें यह बताने का प्रयास करें कि हाँ, हम कुछ ऐसा भारत बनाने जा रहे हैं। 


इति, 
इन्क्लाब- जिन्दाबाद!

                                                                                                                               जयदीप शेखर

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'घोषणापत्र' का PDF संस्करण डाउनलोड करने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें।


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साथियों,  जय हिन्द 1943 में 21 अक्तूबर के दिन सिंगापुर में नेताजी सुभाष द्वारा स्थापित "स्वतंत्र भारत की अन्तरिम सरकार" ...