मंगलवार, 11 अक्तूबर 2016

आह्वान


साथियों, 
जय हिन्द
  • 1943 में 21 अक्तूबर के दिन सिंगापुर में नेताजी सुभाष द्वारा स्थापित "स्वतंत्र भारत की अन्तरिम सरकार" (आरज़ी हुकूमत-ए-आजाद हिन्द/Provisional Government of Free India) को वैधानिक मान्यता देते हुए;
  • "सत्ता-हस्तांतरण" की शर्तों को रद्द करते हुए;
  • "राष्ट्रमण्डल" (कॉमनवेल्थ) की सदस्यता का परित्याग करते हुए;
  • नेताजी सुभाष को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधान का सम्मान देते हुए;
  • 1935 के अधिनियम पर आधारित वर्तमान संविधान के स्थान पर "भारत-भारतीय-भारतीयता" पर आधारित एक नया संविधान लागू करते हुए;
  • देश के सभी "बड़े" भ्रष्टों को निकोबार के किसी टापू पर निर्वासित करते हुए;
  • सरकारी खजाने की लूटी/बर्बाद की गयी राशि की पाई-पाई वसूलते हुए;
  • विश्व-बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन द्वारा संचालित "शोषण-दोहन-उपभोग" पर आधारित वर्तमान विश्व अर्थनीति के चंगुल से देश को मुक्त कराते हुए;
  • "समता-पर्यावरणमित्रता-उपयोग" पर आधारित जनकल्याणकारी नीतियों को लागू करते हुए;
  • 1:15 के अनुपात पर नया सरकारी वेतनमान बनाकर इसी वेतनमान पर बहालियाँ करके नयी भारतीय राष्ट्रीय सेना, पुलिस, प्रशासन, न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य, इत्यादि व्यवस्थाओं का गठन करते हुए;
  • हर नागरिक को शिक्षित बनाते हुए;
  • हर हाथ को रोजगार देते हुए;
  • हर देशवासी के दिल में "भारतीयता" के अहसास को जगाते हुए;
  • भारतीय प्रतिभा, भारतीय श्रमशक्ति तथा भारतीय संसाधनों के बल पर भारत को खुशहाल, स्वावलम्बी एवं शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के लिए...
  • आईये, हम सभी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और शहीदे-आजम भगत सिंह के अनुयायी एक हों, लामबन्द हों, और उनके सपनों के भारत के निर्माण के लिए स्पष्ट रास्ता चुनें और स्पष्ट नीतियाँ बनायें...
  • वर्षों तक सोच-विचार करके व्यक्तिगत रुप से मैं जिस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ, वह यह है कि हमारे भारत को 10 वर्षों के लिए एक विशेष प्रकार की शासन-व्यवस्था की जरुरत है। ऐसी शासन-व्यवस्था, जो विभिन्न विषयों के विद्वानों की एक "चाणक्य सभा" के निर्देशन में अमीरों एवं ताकतवरों के प्रति वज्र से भी कठोर तथा गरीबों एवं कमजोरों के प्रति फूल से भी कोमल रुख अपनाते हुए नीतियाँ बनाये; इस देश को दस वर्षों के अन्दर खुशहाल, स्वावलम्बी एवं शक्तिशाली राष्ट्र बनाये और उसके बाद आदर्श चुनाव का आयोजन करवाते हुए देश में एक "आदर्श लोकतांत्रिक व्यवस्था" कायम करे। 
  • ऐसी शासन-व्यवस्था कायम तो होगी एक जनान्दोलन के माध्यम से ही, मगर उस आन्दोलन को सेना का मौन या नैतिक समर्थन भी हासिल रहना चाहिए। ऐसा तभी सम्भव है, जब इस जनान्दोलन में "पूर्व-सेनानियों' की भूमिका "हरावल"- "अग्रिम दस्ते" की हो- क्योंकि देश में यही एकमात्र समूह है, जिसे "नागरिकों" व "सैनिकों" दोनों का साथ एवं सहयोग मिलेगा! 
  • जहाँ तक समय की बात है, तो ऐसा तभी सम्भव होगा, जब देश के नागरिकों की हर वो उम्मीद चूर-चूर हो जाय, जो उन्होंने विभिन्न राजनेताओं या जननेताओं से लगा रखी है। इसकी शुरुआत हो चुकी है।
  • तब सेना का नैतिक समर्थन हासिल करते हुए एक जनान्दोलन की तैयारी की जा सकती है। तब तक हमारा फर्ज बनता है कि हम लामबन्द- Mobilise-  होने की कोशिश करें तथा अपने सपनों के भारत की स्पष्ट रूपरेखा देशवासियों के सामने रखें।
  • मैं अपनी तरफ से एक "घोषणापत्र"- Manifesto- प्रस्तुत कर रहा हूँ। कृपया इसका अध्ययन करें, संशोधन सुझायें, हो सके, तो अन्यान्य भाषाओं में इसका अनुवाद प्रस्तुत करें और देश की आम जनता के बीच इसे प्रचारित-प्रसारित करते हुए उन्हें यह बताने का प्रयास करें कि हाँ, हम कुछ ऐसा भारत बनाने जा रहे हैं। 


इति, 
इन्क्लाब- जिन्दाबाद!

                                                                                                                               जयदीप शेखर

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शनिवार, 8 अक्तूबर 2016

उन्होंने कहा था-



”इन सुधारकों से कह दो, मैं सुधार में विश्वास नहीं करता, मैं आमूल परिवर्तन में विश्वास करता हूँ।“
- स्वामी विवेकानन्द
"असली स्वराज कुछ लोगों द्वारा सत्ता अधिग्रहण कर लेने पर नहीं आयेगा, बल्कि यह तब आयेगा, जब सारी जनता में इतनी ताकत आ जाये कि जब भी कोई सत्ता का दुरुपयोग करे, तो उसका विरोध कर सकें।"
- महात्मा गाँधी

"लोकतंत्र की सफलता उसी स्थिति में हो सकती है, जब प्रत्येक नागरिक अन्याय के खिलाफ लड़ना अपना कर्तव्य समझे, चाहे वह अन्याय उसका व्यक्तिगत न हो।"
- बाबा अम्बेदकर

"ब्रिटिश साम्राज्यवाद के बाद इस भारत में पहले बीस वर्ष के लिये तानाशाही राज कायम होनी चाहिये। एक तानाशाह ही देश से गद्दारों को निकाल सकता है। भारत को अपनी समस्याओं के समाधान के लिये एक कमाल पाशा की आवश्यकता है।"
- नेताजी सुभाष

"विनाश, रचना के लिये न केवल आवश्यक है, बल्कि अनिवार्य है।"
- भगत सिंह

"कुशासन का विरोध करना ईश्वर की आज्ञा मानना है।"
- फ्रैंकलिन

"सबसे बड़ा सुख उस काम को करने में है, जिसके बारे में लोग यह मानते हों कि आप उसे नहीं कर सकते।"
- वाल्टर बेघाट

"तय करें और जुट जायें। हिचकिचाने वालों ने आज तक इस दुनिया में कोई बड़ा या अच्छा काम नहीं किया है।"
- थॉमस हक्सले
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शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

प्रस्तावना

सड़े हुए पुरातन से चिपके रहना मोह है मित्रों! चारों तरफ से दुर्गन्ध आ रही है। समाज-व्यवस्था हो, शासन-व्यवस्था हो, शिक्षा-व्यवस्था हो, चिकित्सा व्यवस्था हो। हर तरफ से सड़ान्ध की बदबू आ रही है। यहां तक कि रिश्तों से भी, परिवार और परिवार के सदस्यों से भी। कितना भी ढकने-दबाने-छिपाने का प्रयास करो, सड़ी हुई भ्रष्ट व्यवस्था सभी सीमाओं को पार कर हमारी आँखों के सामने स्पष्ट है।
    समाज की धरती सड़ चुकी है। पुराने की अच्छाई मर चुकी है। गन्दगी बच गयी है सिर्फ, जो जहर घोल रही है। विषाक्त कर रही है वातावरण को। ‘विजन’ के अभाव में इस सड़े हुए पुराने से ‘कॅम्प्रोमाइजेज’ कर हम काम चला रहे हैं। वह भी किसी तरह।
    तोड़ने के लिए तोड़ना सेन्सलेस डिस्ट्रक्शन है, निरर्थक संहार है। लेकिन नया बनाने के लिए पुराने को तोड़ना निर्माण है, सृजन की प्रक्रिया है। नया बने, तो पुराना टूटेगा ही। लेकिन यह टूटना मीनिंगफुल है, सेन्सिबल है। तोड़ने के उपकरण अलग होते हैं, बनाने के अलग। ताकत दोनों में चाहिए। तोड़ने और बनाने, दोनों में ताकत की जरूरत पड़ती है। लेकिन बनाने के लिए जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वह है विजन, नये की रूपरेखा। अगर आपका विश्वास हो कि तोड़ने के लिए नहीं तोड़ा जा रहा, बनाने के लिए तोड़ा जा रहा, तो हमको, आपको और सारे समाज को यह काम करना चाहिए। अपना तात्कालिक फायदा देखने की आदत बहुतों को है। इसलिए पुराने से चिपके रहने में जिन्हें फायदा है, वे तो तोड़ने का विरोध करेंगे ही।
    और अगर नयी व्यवस्था से साधारण निरीह लोगों को फायदा होनेवाला हो, तो वे थोड़े-से लोग, जिनके हाथ में सत्ता है, धन-सम्पत्ति केन्द्रित है, विरोध करेंगे ही।
    अभी हाल में ही ‘इण्टरनेट’ पर पढ़ा कि मात्र पच्चासी लोग पृथ्वी की आधी सम्पत्ति के मालिक हैं। विश्व की प्रसिद्ध डेवलपमेण्ट संस्था ‘ऑक्सफैम’ की रिपोर्ट है यह। शीर्षक है- ‘वर्किंग फॉर द फ्यूचर’। जिस व्यवस्था के फलस्वरूप ऐसा असन्तुलन (इम्बैलेन्स) खड़ा हुआ है, उसे तो मुहूर्त भर के लिए भी सहन नहीं करना चाहिए। जड़ से निर्मूल कर, उखाड़ कर ऐसी व्यवस्था को फेंक देनी चाहिए कि भविष्य में दुबारा ऐसी गलती हमसे न होने पाये।
    1947 का अनफिनिश्ड एजेण्डा है मित्रों। उस समय आजादी की लड़ाई से थके-मांदे लोग पुराने को ही स्वीकार कर, दक्षिण एशिया की अपनी सामाजिक विशिष्टताओं की उपेक्षा कर तात्कालिक सन्तुष्टि को ही प्राथमिकता दे बैठे। नये के निर्माण की जद्दोजहद नहीं उठा सके। शायद थक गये थे वे लोग।
    आजादी की लड़ाई थकाने वाली हो गयी थी। गांधी-विनोबा की बातें भी अनसुनी हो गयी। 1952 के प्रथम आम चुनाव ने नरेन्द्रदेव, जयप्रकाश, लोहिया, रामनन्दन-जैसे परिवर्तन के नायकों को रिजेक्ट कर दिया था। सोशलिस्ट पार्टी, जिसके पास नये का विजन-डॉक्युमेण्ट था, रिजेक्ट हो चुकी थी। तब से 66 साल बीत चुके हैं। हम कॅम्प्रोमाइजेज करते गये। अपने संविधान और व्यवस्था में चिप्पियाँ लगाते गये। लेकिन मौलिक रूप से ढाँचा वही पुराना था।
    नयी समाज-व्यवस्था, नयी शासन-व्यवस्था, नयी शिक्षा-व्यवस्था, सब कुछ नया। पुराने को अलविदा कहना ही होगा मित्रों। पुराना अब किसी काम के लायक ही नहीं रहा। इतना ही नहीं, पुराना जहर घोल रहा है।
    सब कुछ नया हो, मंगलकारी हो सबके लिये, इसका उत्साह आपके दिल में हो मित्रों। पुराने को तोड़ कर नया बनाने के लिए विश्वास की जरूरत होगी और आवश्यकता पड़ेगी आपसी भाईचारे की, प्रेम-स्नेह और संवेदनशीलता की। जगत का नाथ जगन्नाथ हमारे अन्तर में हो, तो उसकी ताकत के सहारे हम नया बना लेंगे।
    और, सिर्फ अपने समाज, देश को बदलने की बात नहीं, सिर्फ अपने यहाँ नये को निमंत्रण देने की बात नहीं है। विनोबा का नारा था ‘थिंक ग्लोबली एक्ट लोकली’। अपना घर नया कर लें। फिर पूरी दुनिया बदलनी होगी न। शेष दुनिया भी तो नया खोज रही है मित्रों।
    लेकिन, फिलहाल अपना घर, अपना समाज, अपना देश। नये प्रारूप को अपने यहां स्थापित कर लें। फिर पूरी दुनिया को देंगे वह प्रारूप। पुराना तोड़े बिना नया बनता नहीं। पुराने से मोह न करें मित्रों, वह सड़ चुका है।
    (आध्यात्मिक चिंतक, तपस्वी, प्रचार से नितान्त दूर, अकेले साधना में लगे उदय राघव जी के विचार दैनिक ‘प्रभात खबर’ में दिनांक 2 अप्रैल 2014 को प्रकाशित हुए थे। वहीं से उद्धृत।)
    ***
    मौजूदा अर्थव्यवस्था उपभोग पर आधारित है। लोग सोचते हैं कि और अच्छा जीवन हो, सारी सुख-सुविधायें मिलें, भले ही पर्यावरण पर और दूसरों पर इसका प्रतिकूल असर पड़ता हो।
    ऐसे हालात को बदलने के लिए ही एक वैकल्पिक मॉडल की जरूरत है, जिसमें उपभोक्तावाद न हो। भारत ही ऐसा देश है, जो यह मॉडल दे सकता है।
    भारत, चीन, ब्राजील- जैसे बड़े देशों में सिर्फ भारत के पास ही वैकल्पिक आर्थिक मॉडल देने की क्षमता है। भारत में इतने संसाधन हैं कि यहाँ सभी को बुनियादी सुविधा मिल सकती है। इससे वैश्वीकरण के दौर में भारत अलग-थलग नहीं पड़ेगा।
    आज आयात काफी अधिक क्यों है, क्योंकि हम फिजूलखर्ची कर रहे हैं। देश में पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम पर्याप्त नहीं है। लोग निजी कार की बजाय पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करने लगें, तो पेट्रो-पदार्थ की खपत दस गुनी कम हो जायेगी।
    पूरी लोकतांत्रिक प्रणाली अत्यंत महँगी होती जा रही है। विधायकों और सांसदों की विलासित बढ़ती जा रही है। नेताओं की सुरक्षा पर खर्चे बढ़े हैं। अरबपति सांसदों की संख्या बढ़ रही है। राजनीतिक दलों को हजारों करोड़ रुपये के चन्दे मिल रहे हैं। यह धनतंत्र है या लोकतंत्र?धनतंत्र के सहारे देश का भला कैसे हो सकता है?
    भारत में राजनेता अपने-आप को शासक मानते हैं, जबकि यूरोप तथा अमेरिका में नौकरशाह और राजनेता खुद को पब्लिक-सर्वेण्ट मानते हैं।
    पूरी व्यवस्था कुछ लोगों के हाथों में सिमट गयी। देश में संभ्रान्त वर्ग केन्द्रित नीति अपनायी गयी। इससे संसद में करोड़पति सांसद आने लगे। राजनीतिक पार्टियाँ अमीरों का संगठन बन कर रह गयीं।
    असल में, विकास का मौजूदा मॉडल सही नहीं है। यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि धनतंत्र है। इसी धनतंत्र के कारण नक्सलवाद फैल रहा है। सत्ता के लिए आम लोगों की बुनियादी जरूरतों की बजाय कॉरपोरेट के हित महत्वपूर्ण हो गये हैं....
    मौजूदा शासन प्रणाली और सोच को बदलने की जरूरत है।
    (जे.एन.यू. के प्रोफेसर अरूण कुमार का विस्तृत साक्षात्कार 3 अगस्त 2013 के ‘प्रभात खबर’ में प्रकाशित हुआ था। उसी के कुछ अंश।)
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    ...एक-दो सौ सालों में विशाल नगरीय व्यवस्थायें ऊर्जा एवं पर्यावरण संकट की वजह से खत्म हो जायेंगी। आवागमन की व्यवस्था भी ध्वस्त हो जायेगी। ये चीन की दीवार और मिश्र के पिरामिड की तरह खण्डहर बनकर नुमाइश की चीजें बन जायेंगी।
    ...जिस तरह से औद्योगिक विकास हो रहा है, उससे अब किसी परमाणु युद्ध की जरूरत नहीं है। औद्योगीकरण ही विश्व को बर्बाद करने के लिए काफी है। पर्यावरण की जो स्थिति बन रही है, उससे कहीं-न-कहीं हमलोग उस स्थिति की ओर बढ़ते जा रहे हैं।
    (7 जून 2012 के ‘प्रभात खबर’ में प्रकाशित वरिष्ठ समाजवादी चिन्तक सच्चिदानन्द सिन्हा के साक्षात्कार से उद्धृत।)
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    कहीं आपने भारत के किसी दल या राजनीतिक खेमे में यह चर्चा सुनी कि इस देश को महान बनाने का दस्तावेज हमने तैयार किया है; हम इस राष्ट्रीय बहस चला रहे हैं; हम गाँव-गाँव जायेंगे, घर-घर जायेंगे और राजनीति में नयी इबारत लिखेंगे?
    भारतीय राजनीति सड़ गयी है। इसकी मौजूदा लाश को तुरन्त दफना देना ही शुभ होगा। इसमें नयी हवा, नयी ऊर्जा चाहिए। नयी सृष्टि, नये विचार की ताकत चाहिए और नया खून चाहिए, तब शायद कहीं मौलिक ढंग से अपनी चुनौतियों को हम देख-समझ पायेंगे।
    (7 अक्तूबर 2012 के ‘प्रभात खबर’ में सम्पादक हरिवंश जी ने लिखा था।)
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    हालाँकि लोग अक्सर चर्चा करते हैं कि जब देश में अधिकतर नेता भ्रष्ट हैं और अधिकतर पार्टियाँ प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी में तब्दील हो चुकी हैं, तो जनता के पास विकल्प क्या होगा? विकल्पहीनता का प्रश्न भारतीय मानस को मथता रहता है। लेकिन एक सच यह भी है कि प्रत्येक का विकल्प हमेशा ही मौजूद रहता है, भले ही अवाम उसे पहचानने में देरी करे। कार्ल मार्क्स ने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की परिभाषा में लिखा है कि ‘आदमी कुछ करे या नहीं करे, नियति चुपचाप बैठी नहीं रहती है। वह हमेशा घटनाओं के संघर्ष से कुछ न कुछ नया करती रहती है।’ मार्क्स की यह परिभाषा वैसे दम्भी दलों और नेताओं के लिए एक सबक है, जो समझते हैं कि उनका कोई विकल्प नहीं है!
    प्रचंड वेग से बहती धारा अपना रास्ता स्वयं खोज लेती है। इसी प्रकार, भारतीय राजनीति की कोई अनजान धारा सभी दम्भी विकल्पों को ध्वस्त कर दे, तो कोई आश्चर्य नहीं। और यही एक सच्चे लोकतंत्र की विशेषता भी है।
    (3 जनवरी 2013 के ‘प्रभात खबर’ में बिहार विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष गजेन्द्र प्रसाद हिमांशु जी का एक आलेख प्रकाशित हुआ था। उसी का अन्तिम पाराग्राफ है यह।)
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    अब्राहम लिंकन के राष्ट्रपति बनते ही अमेरिका के दक्षिणी राज्यों ने स्वयं को अमेरिकी संघीय ढांचे से अलग करना शुरु कर दिया। राष्ट्रपति लिंकन ने अमेरिकी राष्ट्र को एकसूत्र में बाँधे रखने के लिए युद्ध पर जाने का निर्णय लिया। इस युद्ध के दौरान राष्ट्रपति लिंकन ने अपने पास लगभग सारे अधिकार केन्द्रित कर लिये। युद्ध के दौरान लिंकन ने सदन, न्यायालय, अन्य संवैधानिक प्रक्रिया-जैसी परम्पराओं की अवहेलना करने से भी परहेज नहीं किया। एक पत्र में राष्ट्रपति लिंकन ने लिखा- ‘देश गँवा के संविधान बचाने का क्या औचित्य है?... शरीर बचाने के लिए एक अंग काटा जाता है लेकिन एक अंग बचाने के लिए पूरे शरीर को नष्ट नहीं किया जा सकता।’
       एक जनवरी, 1863 में राष्ट्रपति लिंकन ने ‘दासत्व मुक्ति घोषणा’ के द्वारा इस युद्ध में अमेरिका के एकीकरण के साथ ही गुलामी का समापन भी जोड़ दिया। 1864 में गृहयुद्ध के चरम पर भी राष्ट्रपति लिंकन ने चुनाव पर जाने का निर्णय लिया, जबकि राष्ट्रपति के सलाहकारों ने भी लिंकन के चुनाव हारने की आशंका जतायी थी। युद्ध के बीच एक राष्ट्रपति के रूप में असाधारण अधिकारों से सम्पन्न होते हुए भी लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाये रखने के लिए चुनाव का निर्णय लेना राष्ट्रपति लिंकन के साहस और ईमानदारी का प्रमाण है।
    (4 अप्रैल 2014 के ‘प्रभात खबर’ में अब्राहम लिंकन पर एक लेख छपा था, जिसके लेखक थे- रविदत्त वाजपेयी। उसी लेख के दो पाराग्राफ।)
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    प्रसन्नता की बात है कि क्रोनी पूँजीवाद (चहेतों को लाभ पहुँचाने वाला यानि लँगोटिया पूँजीवाद) ज्यादा समय तक टिकता नहीं। क्रोनी पूँजीवाद से निबटने का रास्ता क्रान्ति का है। सरकार के सामने विकल्प है कि क्रोनी पूँजीवाद को स्वयं त्याग दे या फिर क्रान्ति का सामना करे।
    (22 जनवरी 2013 के ‘प्रभात खबर’ में प्रकाशित डॉ. भरत झुनझुनवाला के आलेख से उद्धृत।)
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    मैं तो केवल सर्वनाश देख सकता हूँ। भविष्य में क्या होगा, इसकी भविष्यवाणी नहीं कर सकता। पर समाज विचलित हो रहा है। जनता की नाराजगी बढ़ रही है। मेरा मानना है कि संसद वर्तमान स्थिति को रोकने की हालत में नहीं है। सभी पार्टियाँ इन नीतियों (उदारीकरण) की समर्थक हैं, और सांसदों में सड़क पर आने का दम नहीं है।
    मुझे तो लगता है कि एक लाख लोग अगर संसद को घेर लें, तो शायद कुछ हो।
    (30 जुलाई 1998 के ‘जनसत्ता’ में प्रकाशित वयोवृद्ध अर्थशास्त्री डा. अरुण घोष (अब दिवंगत) के साक्षात्कार से उद्धृत अंश।)
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    हमारे देश की सभी संस्थायें (इंस्टीट्यूशन्स) खोखली हो चुकी हैं और संविधान भी शक्तिहीन हो चुका प्रतीत होता है।
    हमारे सांसदों की बड़ी संख्या की आपराधिक पूर्ववृत्ति है। हमारे ज्यादातर नेताओं को भारत से सच्चा प्यार नहीं है। वे ऐसे दुष्ट हैं, जो सुधर नहीं सकते। वे देश को लूटने में लगे हैं। वह देश का धन विदेशी बैंकों के गुप्त खातों में जमा कर रहे हैं। धार्मिक और जातीय दंगे भड़का कर सांप्रदायिक और जातिगत वोटबैंक बनाते हैं। बड़े स्तर पर हमारी अफसरशाही (ब्यूरोक्रेसी) भ्रष्ट हो चुकी है। और दुख की बात है कि यही स्थिति न्यायपालिका के एक हिस्से की भी है, जो किसी मामले के निपटारे में अधिक और असामान्य समय लेती है। सामन्तों के द्वारा हमारे लोकतंत्र का अपहरण कर लिया गया है और अब अधिकांश जगहों पर धार्मिक और जातिगत आधार पर चुनाव होते हैं। किसी को भी उम्मीदवार के गुणों की परवाह नहीं है।
    भारत में भयानक गरीबी है, व्यापक बेरोजगारी है, व्यापक कुपोषण है। आम जनता के बड़े हिस्से के लिए स्वास्थ्य सेवा नदारद है। हमारे आधे से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं। खाद्य-पदार्थों की कीमतें आसमान छू रही हैं। भारत के कई हिस्सों- विदर्भ, गुजरात आदि- में किसान बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं। अल्पसंख्यकों, दलितों और महिलाओं के खिलाफ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष भेदभाव जारी है। कई इलाकों में ऑनर किलिंग, दहेज हत्या, कन्या भ्रूण हत्या रोज की आम घटनाएँ हो चुकी हैं। ज्योतिष और अन्धविश्वास चरम पर है, यहाँ तक कि ‘पढ़े-लिखे’ कहे जानेवाले लोगों के बीच भी। फर्जी बाबा भोले-भाले आम लोगों को मूर्ख बनाने में लगे हैं। भारत में हर चीज प्रदूषित है। भारत के ज्यादातर शहर नरक बन चुके हैं- बिल्कुल नहीं रहने लायक।
    और हमारे नेता, हमारे ‘रहबर’ नीरो की तरह व्यवहार कर रहे हैं, जो रोम जलने के दौरान बाँसुरी बजाने में मस्त था; या फिर, फ्राँसीसी क्रान्ति के पूर्व बोर्बोन्स की भांति व्यवहार कर रहे हैं। ऐसे समय में मुझे याद आता है 20 अप्रैल 1653 का दिन, जब ऑलिवर क्रॉमवेल अपने सैनिकों के साथ ब्रिटिश संसद में घुसा था और वहां मौजूद सदस्यों से उसने कहा थाः
    "यह मेरे लिए सही मौका है, आपके बैठने की इस जगह को खत्म कर देने का, जिसे आपने हर तरह से अपमानित किया है, अपनी बुरी आदतों से अपवित्र किया है। आप अराजक लोग हैं। अच्छी सरकार के दुश्मन हैं। किराये के टट्टू हैं। अभागों के झुण्ड हैं। चाहते हैं कि इसाउ आपके देश को आलुओं के भाव बेच दे, जैसे चन्द रुपयों के लिए जूडस ने अपने प्रभु को धोखा दिया था।
    "क्या आपके अंदर एक भी अच्छा गुण बचा है? क्या ऐसा एक भी अवगुण बचा है, जो आपमें नहीं है? आप तो उतने धार्मिक भी नहीं रहे, जितना मेरा घोड़ा है। सोना आपका भगवान है, रिश्वत के लिए आप में से किसने अपना विवेक नहीं खत्म कर डाला है? क्या आपके बीच ऐसा कोई व्यक्ति है, जिसे राष्ट्रमण्डल की बेहतरी की जरा-सी भी चिन्ता है? आप अनैतिक लोग! क्या आपने इस पवित्र स्थल को अपवित्र नहीं किया है? आपके अनैतिक सिद्धान्तों और दुष्ट कारनामों ने इस ईश्वर के मंदिर को चोरों के अड्डे में तब्दील नहीं कर दिया है?
    "आपलोग पूरे राष्ट्र के लिए अप्रिय और असह्य हो गये हैं। आपको जनता ने अपनी शिकायतों के निवारण के लिए यहां रखा था, और आप यह सब भूल गये। इसलिए, इन सस्ते-चमकते आभूषणों को छीन लो और दरवाजों को बन्द कर दो। किसी अच्छी चीज के लिए आप यहां बहुत देर तक बैठ लिये। मैं कहता हूँ- हटिये। ईश्वर के लिए यहां से जाईये।"
    सैनिकों ने एसेम्बली हॉल से सभी सांसदों को बाहर निकाल दिया और फिर वहां ताला लगा दिया। मुझे लगता है कि भारतीय संसद का भी यही हाल होनेवाला है। व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन अब जरूरी हो गया है। अब टालमटोल नहीं चलेगा। संविधान अब शक्तिहीन हो गया है। भारत की पूरी व्यवस्था, हमारे इंस्टीट्यूशन्स समेत, एक ऐसे मकान की तरह हो गया है, जो पूरी तरह से जीर्ण-शीर्ण है। पुनरुद्धार से कुछ भी हासिल नहीं होगा। पहले इसे ध्वंस करें, फिर नवनिर्माण, यही समय की पुकार है। हमें नयी न्यायोचित समाज व्यवस्था बनानी है, जहां सिर्फ मुट्ठी भर नहीं, बल्कि हर एक इन्सान एक अच्छी जिंदगी जिये।
लेकिन इसे इस व्यवस्था के भीतर से हासिल करना मुमकिन नहीं है। हमारे देश की समस्याओं का समाधान इस व्यवस्था के बाहर है। इसका मतलब हुआ कि हमें एक किस्म की फ्राँसीसी क्रांति करनी होगी।

    (सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व-न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजु का एक विशेष आलेख 23 अगस्त 2015 के ‘प्रभात खबर’ में अनूदित होकर प्रकाशित हुआ था- मूल आलेख अँग्रेजी समाचार पत्रिका ‘आउटलुक’ के स्वाधीनता दिवस विशेषांक’ 2015 में छपा था। उसी के कुछ अंश।)
    ***
    अन्त में, 29 जुलाई 2012 के ‘प्रभात खबर’ में प्रकाशित डॉ. एन.के. सिंह के आलेख ‘आने ही वाला है धरती का टिपिंग प्वाइण्ट’ का जिक्र, जिसमें बताया गया था कि धरती के 43 प्रतिशत जंगल समाप्त हो चुके हैं; 2025 तक 50 प्रतिशत जंगल समाप्त हो जायेंगे। इसके बाद हम चाह कर भी अपने पर्यावरण को पहले-जैसा नहीं बना पायेंगे। इसे वैज्ञानिकों ने 'Point to No Return' कहा है।
    यानि, हमारे पास समय ज्यादा नहीं बचा है!
    ***

भूमिका


यह घोषणापत्र क्या है?

    यह घोषणापत्र देश की प्रायः सभी समस्याओं का विन्दुवार (To the Point) समाधान सुझाता है और समग्र रूप से खुशहाल, स्वावलम्बी और शक्तिशाली भारत के निर्माण का खाका (Blueprint) प्रस्तुत करता है।

यह खाका लागू कैसे होगा?

    इसके लिए देश में 10 वर्षों के लिए एक नये प्रकार की शासन-प्रणाली कायम करनी होगी। इस प्रणाली के तीन प्रमुख अंग होंगे- 1. प्रधानमंत्री (Prime Minister), 2. मंत्री-परिषद (Cabinet) और 3. मंत्री-सभा (Council)। तीनों की व्याख्या नीचे दी जा रही हैः

    प्रधानमंत्रीः एक जागरुक आम नागरिक को दस वर्षों के लिए देश का प्रधानमंत्री नियुक्त करना होगा। विद्वानों की एक मंत्री-परिषद और मंत्री-सभा के मार्गदर्शन एवं नियंत्रण में काम करते हुए वह प्रधानमंत्री प्रस्तुत घोषणापत्र को लागू करेगा और देश को खुशहाल, स्वावलम्बी और शक्तिशाली राष्ट्र बनायेगा। दस वर्षों के बाद एक आदर्श चुनाव का अयोजन करवा कर वह देश में सही मायने में एक ‘लोक’-तांत्रिक या ‘जन’-तांत्रिक व्यवस्था कायम करेगा।
    जिस नागरिक को प्रधानमंत्री नियुक्त किया जायेगा, उसमें कुछ मानवोचित एवं नायकोचित गुण तो होने ही चाहिए, साथ ही, निम्न तीन गुण जरूर होने चाहिए- 1. देशभक्ति, 2. ईमानदारी और 3. साहस। 
  
    मंत्री-परिषदः प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन तथा उस पर नियंत्रण रखने के लिए एक चौदह-सदस्यीय मंत्री-परिषद का गठन किया जायेगा। मंत्री-परिषद में निम्न 14 विषयों/क्षेत्रों के विशेषज्ञ/विद्वान मौजूद होंगे- 1. किसानी, 2. मजदूरी, 3. खेल-कूद, 4. विज्ञान, 5. संस्कृति, 6. शिक्षा, 7. नारी-सशक्तिकरण, 8. विदेश-नीति, 9. राष्ट्रीय सुरक्षा, 10. संविधान/न्याय, 11. अर्थनीति, 12. पर्यावरण, 13. समाजसेवा और 14. लेखन/पत्रकारिता।   
    मंत्री-परिषद के लिए जिन विशेषज्ञ/विद्वानों का चयन किया जायेगा, वे देश/समाज के वरिष्ठ, सम्मानित एवं सच्चरित्र नागरिक होंगे। इनके चयन के लिए देश के सभी भाषाओं के अखबारों के सम्पादकों से सुझाव मँगवाये जायेंगे। सम्पादकगण चाहें, तो अपने निजी सुझाव के साथ एक जनमत-सर्वेक्षण करवा कर उसके परिणाम भी संलग्न कर सकेंगे। इसके अलावे, सोशल-मीडिया पर भी एक सर्वेक्षण करवाया जा सकता है।
    प्रस्तुत घोषणापत्र की बातों के अलावे किसी और मुद्दे पर निर्णय लेते समय प्रधानमंत्री के लिए मंत्री-परिषद के 14 में से कम-से-कम 9 सदस्यों (दो-तिहाई) की सहमति लेना अनिवार्य होगा।
    इस मंत्री-परिषद को सिर्फ ‘परिषद’ कहा जा सकता है। (बोल-चाल में इसे ‘चाणक्य सभा’ भी कहा जा सकता है।)

    मंत्री-सभाः परिषद के सदस्यगण अपने-अपने विषय/क्षेत्र से जुड़े 5 सहयोगी चुनेंगे। इन पाँच सहयोगियों में से किसी एक को वे अपना उत्तराधिकारी भी नामित करेंगे। परिषद के सदस्य स्वयं देश के जिस अंचल से आयेंगे, उस अंचल को छोड़कर बाकी पाँच अंचलों से एक-एक सहयोगी को वे चुनेंगे। (प्रस्तुत घोषणापत्र में यथास्थान देश के कुल छह अंचलों की बात कही गयी है- उत्तर-पूर्वांचल, पूर्वांचल, पश्चिमांचल, उत्तरांचल, दक्षिणांचल और मध्यांचल।) परिषद के सदस्यों से यह अपेक्षा की जायेगी कि वे अपने कम-से-कम तीन सहयोगियों की सहमति से ही कोई निर्णय लेकर उसे प्रधानमंत्री तक पहुँचायें।
    परिषद के 70 सहयोगियों के समूह को ‘मंत्री-सभा’ या सिर्फ ‘सभा’ नाम दिया जायेगा।
    जटिल एवं महत्वपूर्ण मामलों पर विचार-विमर्श ‘परिषद’ एवं ‘सभा’ के संयुक्त अधिवेशनों में हुआ करेगा।
    संयुक्त अधिवेशन के दौरान दो-तिहाई- यानि 56- सदस्य मिलकर प्रधानमंत्री के किसी निर्णय को ‘वीटो’ भी कर सकेंगे, बशर्ते कि वह निर्णय प्रस्तुत घोषणापत्र की बातों से बाहर का हो।

    परिषद/सभा के सदस्यों से अपेक्षाः परिषद/सभा के सदस्यों से यह अपेक्षा रखी जायेगी कि वे प्रस्तुत घोषणापत्र और निम्न धारणाओं या विचारधाराओं के प्रति अपनी सहमति एवं प्रतिबद्धता व्यक्त करेंगेः-
    1. वर्तमान ‘औपनिवेशिक’ व्यवस्था को हटाकर इसके स्थान पर एक मौलिक एवं भारतीय व्यवस्था कायम करना।
    2. नयी कायम होने वाली व्यवस्था को नेताजी सुभाष और शहीद भगत सिंह के विचारों/सपनों के अनुरूप बनाना।
    3. शोषण, दोहन और उपभोग पर आधारित वर्तमान अर्थनीति के स्थान पर समता, पर्यावरण-मित्रता और उपयोग पर आधारित अर्थनीति को अपनाना।
    4. एक देश- भारत, एक नागरिकता- भारतीय और एक संस्कृति- भारतीयता (Indianity) के सिद्धान्त को अपनाना।   
    5. भारतीय श्रमशक्ति, भारतीय प्रतिभा और भारतीय संसाधनों पर पूर्ण विश्वास- कि इनके बल पर भारत को खुशहाल, स्वावलम्बी और शक्तिशाली बनाया जा सकता है।
    6. आवश्यकतानुसार सरकार द्वारा गरीबों, कमजोरों एवं आम लोगों के प्रति ‘फूल से भी कोमल’ और अमीरों, ताकतवरों एवं खास लोगों के प्रति ‘वज्र से भी कठोर’ रवैया अपनाते हुए नीतियाँ बनाना।
    7. सत्ता के विकेन्द्रीकरण पर विश्वास- अर्थात् ‘स्थानीय स्वशासन’ को सुदृढ़ बनाना।
    8. भारत के नेतृत्व में एक आदर्श विश्व-व्यवस्था की स्थापना करने के लिए प्रयास करना।

क्या यह घोषणापत्र पत्थर की लकीर है?

    नहीं, इसमें आवश्यकतानुसार तथा परिस्थितियों के अनुसार बदलाव किये जायेंगे, मगर बदलाव नदी के बहते जल के समान होंगे- नदी के किनारे नहीं बदलते। प्रस्तुत घोषणापत्र में भी 1. देश की खुशहाली और 2. आम जनता की भलाई को ध्यान में रखते हुए ही बदलाव किये जायेंगे।
    बदलाव जब प्रधानमंत्री करना चाहे, तो उसके लिए परिषद के 5 सदस्यों की सहमति आवश्यक होगी; और बदलाव जब परिषद या सभा के सदस्य लाना चाहें, तो संयुक्त अधिवेशन में दो-तिहाई का बहुमत आवश्यक होगा।

नयी शासन-प्रणाली कैसे कायम होगी?

    आम तौर पर यह माना जाता है कि भारतीय कौम एक मुर्दा कौम है, ज्यादातर भारतीय लकीर के फकीर होते हैं और किसी बड़े परिवर्तन के लिए वे राजी नहीं होते हैं। लेकिन चूँकि इसी देश में नेताजी सुभाष और भगत सिंह-जैसे क्रान्तिकारी भी पैदा होते हैं, इसलिए यह आशा की जा सकती है कि भारतीय नागरिकों व सैनिकों के बीच 2-4 प्रतिशत ऐसे लोग जरूर मौजूद हैं, जो जागरूक हैं, देश के वर्तमान एवं भविष्य को लेकर सोच-विचार करते हैं और जो यह मानते हैं कि देश की व्यवस्था में बड़े परिवर्तन की आवश्यकता है।
    यही 2-4 प्रतिशत नागरिक व सैनिक अगर चाह लें, तो 10 वर्षों के लिए उपर्युक्त शासन-प्रणाली को कायम करने का रास्ता निकाला जा सकता है।    
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अध्याय-1: शासन-प्रशासन

    शासन

1.1    देश में दस वर्षों के लिए कायम होने वाली नयी शासन-प्रणाली को प्रस्तुत घोषणापत्र में अब से ‘राष्ट्रीय सरकार’ कहा जायेगा।
1.2    राष्ट्रीय सरकार के सभा भवन, सत्र तथा कार्यवाही का विस्तृत विवरण परिशिष्ट- ‘अ’ में दिया जा रहा है, जो काफी हद तक ‘प्रत्यक्ष लोकतंत्र’-जैसा होगा।
1.3    राष्ट्रीय सरकार के पहले सत्र की पहली बैठक में चार महत्वपूर्ण घोषणायें जारी की जायेंगी- नये राष्ट्र, नये संविधान, नयी व्यवस्था तथा भावी ‘लोकतांत्रिक’ चुनावों पर।
1.4    नये राष्ट्र की घोषणाः 1947 के ‘सत्ता-हस्तान्तरण अधिनियम’ को रद्द करते हुए तथा ‘राष्ट्रमण्डल’ (कॉमनवेल्थ) की सदस्यता का परित्याग करते हुए 21 अक्तूबर 1943 के दिन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा सिंगापुर में स्थापित ‘स्वतंत्र भारत की अन्तरिम सरकार’ को वैधानिक मान्यता दी जायेगी और नेताजी को स्वतंत्र भारत का पहला प्रधान माना जायेगा। (ऐसा होने से 21 अक्तूबर हमारा स्वतंत्रता दिवस बन जायेगा। वर्तमान स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त की वास्तविकता जानने के लिए कृपया परिशिष्ट- ‘आ’ देखें।)
1.5    नये संविधान की घोषणाः देशभर के विद्वानों को लेकर एक ‘संविधान महासभा’ के गठन की घोषणा की जायेगी, जो नागरिकों से विचार मँगवाकर "एक राष्ट्र- भारत, एक नागरिकता- भारतीय और एक संस्कृति- भारतीयता" के आधार पर एक नये संविधान का प्रारूप बनायेगी; इस प्रारूप पर देशभर में बाकायदे विचार-मन्थन होगा; आवश्यकतानुसार संशोधित प्रारूप प्रस्तुत किया जायेगा और अन्त में, 60 प्रतिशत से ज्यादा नागरिकों की सहमति से इसे लागू कर दिया जायेगा। (संविधान जब भी बनकर तैयार हो, इसे लागू 26 जनवरी के दिन ही किया जायेगा- इस प्रकार, यह दिन हमारा ‘गणतंत्र दिवस’ बना रहेगा। जब तक नया संविधान तैयार नहीं होता, वर्तमान संविधान के "नीति-निदेशक तत्व" प्रभावी रहेंगे।)
1.6    नयी व्यवस्था की घोषणाः प्रस्तुत घोषणापत्र में एक नये सरकारी वेतनमान का (अध्याय- 8 में) जिक्र है, उसी के तहत लाखों की संख्या में युवाओं की बहाली करते हुए, उन्हें नये ढंग से प्रशिक्षित करते हुए उन्हीं के बल पर नयी भारतीय राष्ट्रीय- सेना, प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा, न्यायपालिका, शिक्षा व्यवस्था, चिकित्सा व्यवस्था इत्यादि के गठन की घोषणा की जायेगी। (जब तक ‘भारतीय राष्ट्रीय’ सेवाओं के गठन का काम पूरा नहीं होता, वर्तमान ‘औपनिवेशिक’ सेवायें काम करती रहेंगी। जैसे-जैसे ‘भारतीय राष्ट्रीय’ सेवाओं के गठन का काम पूरा होते जायेगा, ‘औपनिवेशिक’ सेवाओं को समाप्त किया जायेगा। ‘औपनिवेशि’ सेवाओं के कर्मी भी ‘नये वेतनमान’ को अपनाते हुए ‘राष्ट्रीय सेवाओं’ में शामिल हो सकेंगे।)
1.7    भावी लोकतांत्रिक चुनावों की घोषणाः एक आदर्श चुनाव-व्यवस्था के तहत भावी लोकतांत्रिक चुनावों के लिए बाकायदे तिथियों की घोषणा की जायेगी- पाँचवें वर्ष में ग्राम-पंचायतों एवं वार्ड परिषदों के गठन के लिए; सातवें वर्ष में (प्रखण्ड-स्तरीय) ”जनसंसदों“ के गठन के लिए; नवें वर्ष में विधानसभाओं के गठन तथा मुख्यमंत्रियों के चयन के लिए और दसवें वर्ष में राष्ट्रीय संसद के गठन और प्रधानमंत्री के चयन के लिए। (कृपया अध्याय- 20 से 26 देखें।)
1.8    पहले सत्र की पहली बैठक में ही भारतीय जनता की ओर से द्वितीय विश्वयुद्ध के दिनों में नेताजी सुभाष की मदद करने के लिए जर्मनी और जापान के प्रति आभार एवं धन्यवाद प्रकट किया जायेगा और इन दोनों देशों के राजदूतों के हाथों में आभार एवं धन्यवाद पत्र सौंपा जायेगा।
1.9    कायदे से, राष्ट्रीय सरकार के गठन के तुरन्त बाद ही राज्यों की विधानसभाओं को भंग कर वहाँ भी राष्ट्रीय शासन लागू किया जाना चाहिए, मगर जनता की चुनी हुई सरकारों को अपना कार्यकाल पूरा करने का अवसर देते हुए राज्य सरकारों को वेतन-भत्तों-सुविधाओं तथा फिजूलखर्ची में कटौती करते हुए घाटे का बजट नहीं बनाने का निर्देश दिया जायेगा; मगर साथ ही, लगातार तीसरे वर्ष घाटे का बजट पेश करने वाली राज्य सरकार को बर्खास्त कर वहाँ राष्ट्रीय शासन लागू कर दिया जायेगा।

    प्रशासन

1.10    प्रशासन, पुलिस, सेना तथा न्यायपालिका में ईमानदार, कर्मठ एवं सच्चरित्र छवि रखने वाले कार्यरत उच्चाधिकारियों को आमंत्रित कर ‘राष्ट्रीय सचिवालय’ का गठन किया जायेगा। (राष्ट्रीय सरकार द्वारा लिये गये निर्णयों को अमली जाम पहनाने की जिम्मेवारी इस सचिवालय की ही होगी।)
1.11    इसके विपरीत, प्रशासन, पुलिस, सेना तथा न्यायपालिका में दागदार छवि रखने वाले उच्चाधिकारियों को लम्बी छुट्टी पर भेज दिया जायेगा। (छुट्टी के दौरान उन्हें सिर्फ ‘मूल वेतन’ दिया जायेगा।)
1.12    ईमानदार व दागदार छवि वाले उच्चाधिकारियों की सूची सतर्कता आयोग, मानवाधिकार आयोग और नागरिक अधिकार संगठनों से मँगवायी जायेगी। (नागरिक भी ऐसे अधिकारियों की सूचना इन संस्थाओं को दे सकेंगे।)
1.13    प्रशासनिक अधिकारियों को सिर्फ प्रशासनिक विभागों का मुखिया बनाया जायेगा; दूसरे विभागों वे सिर्फ ‘प्रशासन’ का काम देखेंगे; किसी भी विभाग का मुखिया उस विभाग के विषय के किसी विशेषज्ञ को ही बनाया जायेगा- यहाँ तक कि उसका पहले से सरकारी अधिकारी होना कोई जरूरी नहीं होगा।
1.14    भारतीय राष्ट्रीय नागरिक सेवाओं (अब का आई.ए.एस.) की परीक्षाओं में उन्हीं युवाओं को शामिल होने दिया जायेगा, जिन्होंने ‘सामाजिक कार्यों’, ‘सांस्कृतिक गतिविधियों’ और ‘साहसिक अभियानों’ में भाग लिया हो। (आगे चलकर सामाजिक कार्य के रूप में बेसहारों के लिए स्थापित होने वाले आश्रयों (क्रमांक- 29.4) में ‘स्वयंसेवा’; सांस्कृतिक गतिविधियों के रूप में प्रतिवर्ष बसन्त एवं शरत् ऋतु में आयोजित होने वाले भारतीय सभ्यता-संस्कृति उत्सवों (क्रमांक- 54.6) में भागीदारी, और साहसिक अभियान के रूप में साइकिल पर देशाटन (क्रमांक- 52.4) को अनिवार्य किया कर दिया जायेगा।)
1.15    पुलिस द्वारा नागरिक या नागरिक समूह पर बल-प्रयोग करने और नागरिकों की गिरफ्तारी/हिरासत से पहले न्यायपालिका (या ‘सतर्कता-मजिस्ट्रेट’- जिक्र अध्याय- 5 में) की अनुमति अनिवार्य कर दी जायेगी।
1.16    घोषित, संगठित, भूमिगत तथा फरार अपराधियों की गिरफ्तारी या इनपर बलप्रयोग के लिए किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी; बल्कि इनके खिलाफ एक विशेष अभियान चलाकर इन सबको सलाखों के पीछे पहुँचाया जायेगा।
1.17    आग्नेयास्त्रों के लाइसेन्स अगले आदेश तक के लिए निलम्बित करते हुए वैध-अवैध सभी प्रकार के आग्नेयास्त्र जमा/जब्त किये जायेंगे- हालाँकि वैध हथियारों के मामले में किसी की गिरफ्तारी नहीं की जायेगी।
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अध्याय- 2: अलगाववाद, आतंकवाद तथा भेद-भाव के खिलाफ

    अलगाववाद

2.1    देश के ”नागरिक क्षेत्रों“ में तैनात सैनिकों/अर्द्धसैनिकों को वापस बैरकों में बुला लिया जायेगा- चाहे वे क्षेत्र मणिपुर के हों या काश्मीर के, या देश के किसी भी हिस्से के।
2.2    देश के सभी अलगाववादी, अतिवादी एवं हथियारबन्द समूहों के खिलाफ पुलिस/सैन्य कार्रवाई स्थगित करते हुए उनसे यह पूछा जायेगा कि वे भारत राष्ट्र, भारतीय नागरिकों तथा भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान एवं प्रेम की भावना रखते हैं या नहीं- ?
2.3    जिन समूहों का उत्तर ‘हाँ’ में होगा, उनके नेताओं से बातचीत की जायेगी और संविधान के नीति-निदेशक तत्वों तथा प्रस्तुत घोषणापत्र की घोषणाओं के दायरे में- जहाँ तक सम्भव होगा- उनकी माँगों को मान लिया जायेगा।
2.4    जिन समूहों का उत्तर ‘नहीं’ में होगा, या जो उत्तर नहीं देंगे, उनपर प्रतिबन्ध लगाया जायेगा और उनके खिलाफ यथोचित कार्रवाई की जायेगी।

    आतंकवाद

2.5    आतंकवाद के खिलाफ एक एकीकृत कमान का गठन किया जायेगा, जिसके अन्दर गुप्तचर विभाग, कमाण्डो बल तथा फास्ट ट्रैक कोर्ट इत्यादि होंगे- इस प्रकार, अपनी खुद की सुरक्षा/प्रतिरक्षा व्यवस्था, सूचना तंत्र तथा आतंकवादियों को सजा देने की व्यवस्था को चाक-चौबन्द एवं चुस्त-दुरुस्त बनाया जायेगा।
2.6    आतंकवादियों के साथ कभी भी, किसी भी कीमत पर बातचीत या समझौता नहीं करने की नीति अपनायी जायेगी।

    भेद-भाव

2.7    चूँकि राष्ट्रीय सरकार अपने सभी नागरिकों को एक समान मानेगी, अतः जो कोई भी अपने विचारों या कार्यों से देश के अन्दर जन्म, धर्म, लिंग, रंग, भाषा, क्षेत्र इत्यादि के आधार पर किसी भी तरह का भेद-भाव, ऊँच-नीच, उन्माद, वैमनस्य इत्यादि पैदा करने की कोशिश करेगा- वह बाद में अगर क्षमायाचना करता है- तो उसे पहली बार में चेतावनी, दूसरी बार में जुर्माने तथा तीसरी बार में 3 महीनों के ‘निर्वासन’ की सजा दी जायेगी; और अगर वह क्षमायाचना से इन्कार करता है और अपने दकियानूसी एवं कट्टरपन्थी विचारों पर कायम रहता है, तो उसे पहली बार में ही ‘निर्वासन’ की सजा दी जायेगी, जो उसके द्वारा क्षमायाचना करने तक जारी रहेगी।
2.8    कहने की आवश्यकता नहीं, निर्वासन के लिए अण्डमान-निकोबार द्वीपसमूह के एक टापू को चुना जायेगा, जहाँ जीवन की मूलभूत आवश्यकतायें उपलब्ध रहेंगी- पर्यावरण को नुकसान पहुँचाये बिना।
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अध्याय- 4: उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार नियंत्रण

4.1    पुलिस, प्रशासन, सेना/अर्द्धसैन्य बल, न्यायपालिका तथा विधायिका के अन्दर उच्च एवं सर्वोच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के आचरण पर नजर रखने के लिए लोकपाल संस्था (इसे बोल-चाल में "पंच-परमेश्वर" का नाम दिया जा सकता है) संस्था का गठन किया जायेगा, जिसकी निम्न विशेषतायें होंगीः
(क) प्रारम्भ में पुलिस, प्रशासन, सेना/अर्द्धसैन्य बल, न्यायपालिका तथा विधायिका से बेदाग चरित्र वाले अवकाशप्राप्त नागरिकों को लेकर इस संस्था का गठन किया जायेगा।
(ख) "पंच-परमेश्वर" में ‘मुख्य पंचों’ की संख्या तो पाँच ही होगी, मगर उनके नीचे पूरी एक टीम होगी, जिसमें 21 से 101 तक सदस्य (व्यस्तता के आधार पर) हो सकेंगे।
(ग) पुलिस, प्रशासन, सेना/अर्द्धसैन्य बल, न्यायपालिका तथा विधायिका के सर्वोच्च एवं उच्च पदाधिकारियों के आचरण पर यह संस्था नजर रखेगी तथा उनके आचरण से सम्बन्धित तथ्यों, आँकड़ों, सबूतों का संकलन एवं विश्लेषण करेगी।
(घ) नागरिक अपनी ओर से भी अपने नाम के साथ या गुमनाम रहकर ऐसी जानकारियाँ भेज सकेंगे; साथ ही, जरूरत पड़ने पर पंच-परमेश्वर द्वारा ‘जनमत-सर्वेक्षण’ भी करवाया जा सकेगा।
(ङ) प्रत्येक राज्य में भी "पंच-परमेश्वर" की एक-एक इकाई होगी, जो राज्यों के सर्वोच्च एवं उच्च पदाधिकारियों के आचरण पर नजर रखेगी।
(च) थाना स्तर पर इस प्रकार की जो इकाई होगी, उसे "पंच-परमेश्वर" न कहकर अगले अध्याय में "सतर्कता-मजिस्ट्रेट" कहा गया है- ये निचले स्तर पर भ्रष्टाचार का खात्मा करेंगे।)
(छ) राष्ट्रीय अन्वेषण ब्यूरो (आज की सी.बी.आई. के स्थान पर), राज्यों के अन्वेषण ब्यूरो       तथा अन्यान्य सभी सरकारी जाँच एजेन्सियाँ "पंच-परमेश्वर" के निर्देशानुसार कार्य करेंगी।
(ज) यह संस्था प्रतिवर्ष अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करेगी, जिसमें अच्छा आचरण रखने एवं नागरिकों/मातहतों की आकांक्षाओं पर खरे उतरने वाले पदाधिकारियों के नाम ‘सफेद सूची’ में दर्शाये जायेंगे।
(झ) इसके विपरीत, खराब आचरण रखने एवं नागरिकों/मातहतों को परेशान करने वाले अधिकारियों के नाम ‘काली सूची’ में दर्शाये जायेंगे।
(ञ) जिन अधिकारियों के बारे में यह आशंका होगी कि वे किसी किस्म के भ्रष्टाचार या अपराध में लिप्त हैं, उनके नाम ‘लाल सूची’ में दर्ज किये जायेंगे।
(ट) बाकी बचे सर्वोच्च/उच्च पदाधिकारियों को अपने-आप ‘भूरी सूची’ में दर्ज मान लिया जायेगा।
(ठ) ‘सफेद सूची’ में लगातार 3 बार, या कुल-मिलाकर 5 बार दर्ज होने वाले अधिकारियों को 5 वर्षों के लिए "पंच-परमेश्वर" में शामिल किया जा सकेगा।
(ड) इसके विपरीत, ‘काली सूची’ में लगातार 3 बार, या कुल-मिलाकर 5 बार दर्ज होने वालों को तत्काल प्रभाव से 5 वर्षों के लिए निलम्बित कर दिया जायेगा।
(ढ) ‘लाल सूची’ में दर्ज होने वालों को सूची प्रकाशित होने 24 घण्टों के अन्दर राष्ट्रीय जाँच एजेन्सी द्वारा 90 दिनों के लिए हिरासत में लिया जायेगा, उनपर लगे आरोपों की जाँच की जायेगी और आवश्यकतानुसार आरोपपत्र दाखिल किये जायेंगे।
(ण) बाकी की कार्रवाई अण्डमान स्थित विशेष न्यायालय में चलेगी- जैसा कि पिछले अध्याय में जिक्र हो चुका है।
(त) इस मामले में सिर्फ राष्ट्रपति महोदय, प्रधानमंत्री, सर्वोच्च न्यायाधीश तथा मुख्य चुनाव आयुक्त को थोड़ी राहत दी जायेगी- राष्ट्रपति महोदय के विरुद्ध अभियोग लाने से पहले प्रधानमंत्री, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और मुख्य चुनाव आयुक्त से सहमती लेनी होगी; इसी प्रकार, इन तीनों प्रमुखों के विरुद्ध अभियोग लाने से पहले राष्ट्रपति महोदय से अनुमति लेनी होगी (यह सहमति/अनुमति भी सांकेतिक होगी- तीन महीनों में सहमति/अनुमति को ‘प्राप्त’ मान लिया जायेगा)- बाकी किसी को निलम्बित करने/हिरासत में लेने से पहले किसी से भी अनुमति या सहमती लेने की जरूरत नही रहेगी। 
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आह्वान

साथियों,  जय हिन्द 1943 में 21 अक्तूबर के दिन सिंगापुर में नेताजी सुभाष द्वारा स्थापित "स्वतंत्र भारत की अन्तरिम सरकार" ...